अभी तो खाली हू...
अभी तो प्यासा हू...
अभी तो अधूरा हू...
अभी मै हू ही नही...
निर्माण के प्रथम चरण कि इमारत सा...
हर रोज आकार मे थोडा और उभरता जाता हू...
वक़्त आने पर द्वार पर रंगोली सजेगी...
कुमकुम मे रंगी दस उन्गालियोँ कि छाप दीवारों पर चढेगी ...
जब तुम्हारे हाथ मे टिकेगा एक दोना...
और मुह मे घुलेगी मिठास...
तब समझना हो गया हू मैं पुरा...
अभी मैं बन रहा हू ....
अभी मैं हू अधूरा।
2 टिप्पणियां:
कविता में एहसास और विश्वास का भाव सुंदर है .
aap bahut acha likhte hai...yunhi aap ke blog par aana hua aur kaufi dilchasp maloom hue aap aur aapke shabd.
एक टिप्पणी भेजें